सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर होगा सीईसी और ईसी का दर्जा, राज्यसभा ने सेवा शर्त संबंधी विधेयक को दी मंजूरी

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नई दिल्ली। राज्यसभा ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्तियों व उनकी सेवा शर्तों को विनियमित करने के लिए एक विधेयक पारित किया, जिसका विरोध करते हुए विपक्ष ने उच्च सदन से बहिर्गमन किया। राज्यसभा ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा शर्तों को विनियमित करने के लिए एक विधेयक पारित किया, जिसमें उनके आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए उनके दर्जे को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के बराबर बनाए रखने, चयन समिति का उन्नयन करने और उन्हें अदालती मामलों से बचाने के लिए एक नया प्रावधान जोड़ने जैसे महत्वपूर्ण संशोधन शामिल हैं।

विधेयक ध्वनिमत से पारित हो गया जबकि विपक्षी सदस्यों ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित विधेयक चुनाव प्राधिकार को कार्यपालिका के अधीन करता है और संविधान का उल्लंघन करता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह सीईसी और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति पर उच्चतम न्यायालय के आदेश को दरकिनार करने का प्रयास है और मंत्री के जवाब पर नाखुशी जाहिर करते हुए सदन से बहिर्गमन किया। इस साल अगस्त में जब उच्च सदन में विधेयक पेश किया गया था तो विपक्षी दलों और कुछ पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्तों ने निर्वाचन आयोग के सदस्यों की तुलना कैबिनेट सचिव से किए जाने पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने दावा किया था कि इस कदम से संस्थान की स्वतंत्रता से समझौता होगा। वर्तमान में, सीईसी और निर्वाचन आयुक्तों को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश का दर्जा प्राप्त है। संशोधन लाकर सरकार ने उस दर्जे को बरकरार रखा है।

बहस का जवाब देते हुए कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि चयन समिति के ढांचे में सुधार के लिए कुछ संशोधन लाए गए हैं, जिसे पहले कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में प्रस्तावित किया गया था। उन्होंने कहा कि इसके बजाय यह कानून मंत्री की अध्यक्षता में होगा जिसमें दो केंद्रीय सचिव सदस्य होंगे। मेघवाल ने कहा कि उनके द्वारा पेश किए गए एक अन्य संशोधन के तहत, सीईसी और अन्य आयुक्तों को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन के बराबर वेतन का भुगतान किया जाएगा। विधेयक में पहले प्रस्ताव किया गया था कि सीईसी और निर्वाचन आयुक्तों का वेतन कैबिनेट सचिव के वेतन के बराबर होगा। कानून मंत्री ने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों के खिलाफ अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए की गई कार्रवाई के लिए कानूनी कार्यवाही शुरू करने से संरक्षण से संबंधित एक नया प्रावधान भी संशोधनों के माध्यम से पेश किया गया है।

तेलंगाना उच्च न्यायालय ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार और कई अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के लिए पुलिस को दिए गए ‘निर्देश’ के सिलसिले में एक विशेष सत्र न्यायाधीश को निलंबित कर दिया था। इसके आलोक में, मेघवाल ने बताया कि नए प्रावधान में ऐसी घटनाओं को रोकने की बात कही गई है। वहीं, एक अन्य प्रस्तावित संशोधन में यह स्पष्ट किया गया है कि जिस प्रकार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को उनके पद से हटाने का प्रावधान है वही मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर लागू होगा। इसमें यह भी कहा गया है कि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के अलावा पद से नहीं हटाया जा सकेगा। निर्वाचन आयोग के एक पूर्व पदाधिकारी ने कहा कि ये दोनों स्पष्टीकरण निर्वाचन आयोग से संबंधित अनुच्छेद 324 में उल्लिखित संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हैं।

मेघवाल अपने जवाब में कहा कि निर्वाचन आयोग का कामकाज निष्पक्ष रहा है और यह ऐसा ही रहेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार इसे इसी तरह से बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि नए कानून की आवश्यकता इसलिए पड़ी है क्योंकि पहले के अधिनियम में कमजोरियां थीं। मेघवाल ने विपक्ष के इन आरोपों का भी खंडन किया कि यह विधेयक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्तियों से संबंधित उच्चतम न्यायालय के एक फैसले को दरकिनार करने के लिए लाया गया है। उन्होंने कहा, यह विधेयक जो हम लाए हैं वह उच्चतम न्यायालय के खिलाफ नहीं है। इसे उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार लाया गया है। यह अनुच्छेद 324 (2) के तहत सूचीबद्ध प्रावधानों के अनुसार है। यह संविधान के अनुच्छेद 50 के तहत सूचीबद्ध शक्तियों के पृथक्करण का भी अनुसरण करता है। यह विधेयक तब लाया गया था जब मार्च में उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय समिति इन आयुक्तों की नियुक्ति पर संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक सीईसी और चुनाव आयुक्तों का चयन करेगी।

विधेयक के अनुसार, प्रधानमंत्री चयन समिति के प्रमुख होंगे जबकि लोकसभा में विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री अन्य दो सदस्य होंगे। बहस के दौरान कांग्रेस सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित कानून संविधान की मूल भावना को पूरी तरह नकारता है और उसका उल्लंघन करता है। उन्होंने आरोप लगाया, ”यह निर्वाचन आयोग को पूरी तरह नकारता है और कार्यपालिका के अधिकार के अधीन करता है और यह स्वेच्छा से, दुर्भावनापूर्ण तरीके से उच्चतम न्यायालय के फैसले को खत्म करता है और यही कारण है कि यह कानून मृत बच्चे की तरह है। बीजू जनता दल (बीजद) के अमर पटनायक ने विधेयक का समर्थन किया और तर्क दिया कि सीईसी की स्वतंत्रता को बनाए रखा गया है और ‘चुनाव प्रक्रिया में स्वतंत्रता एवं हस्तक्षेप का कोई अपमान नहीं है’, जैसा कि विपक्षी सदस्यों द्वारा तर्क दिया गया है।

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