भारत में ‘सरोगेसी उद्योग’ को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए: दिल्ली हाईकोर्ट

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दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि भारत में ‘सरोगेसी उद्योग’ (किराए की कोख के उद्योग) को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। अदालत ने यह टिप्पणी कनाडा में रहने वाले भारतीय मूल के दंपति की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। दंपति ने दान ‘सरोगेसी’ को प्रतिबंधित करने के लिए सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम में संशोधन के लिए जारी की गई केंद्र सरकार की अधिसूचना को चुनौती दी है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की पीठ ने कहा कि सरोगेसी नियमों में बदलाव अदालतों के कहने पर हुआ है।

पीठ ने कहा, अदालत को अब इस सबमें क्यों पड़ना चाहिए? इस उद्योग (सरोगेसी) को यहां प्रोत्साहित करने की जरूरत नहीं है। आप कनाडा में रहते हैं। आप यहां उद्योग नहीं चला सकते हैं। यह एक अरब डॉलर का उद्योग बन जाएगा। यह ऐसा मामला नहीं है जहां हमें सरकार से कुछ भी करने के लिए कहना चाहिए। इसने मामले को आगे की सुनवाई के लिए 15 जनवरी 2024 को सूचीबद्ध किया, जब इसी तरह की अन्य याचिकाओं पर भी सुनवाई की जाएगी।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे भारतीय नागरिक हैं जिन्होंने हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार कानूनी रूप से शादी की है और भारत के स्थायी निवासी हैं। उन्होंने कहा कि वे निःसंतान दंपति हैं और उन्हें चिकित्सीय परेशानी है जिसके कारण सरोगेसी की जरूरत पड़ी है और इसके माध्यम से वे माता-पिता बनना चाहते हैं। याचिका में कहा गया है कि दंपति को अंडाणु दान के माध्यम से ‘सरोगेसी’ के लिए दिसंबर 2022 में चिकित्सा संकेत प्रमाणपत्र प्रदान किया गया था और कहा गया था कि वे ‘सरोगेसी’ प्रक्रिया शुरू करा सकते हैं। हालांकि, 14 मार्च 2023 को केंद्र सरकार ने ‘सरोगेसी’ विनियमन को संशोधित करने के लिए एक अधिसूचना जारी की और दान ‘सरोगेसी’ को प्रतिबंधित कर दिया।

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